Saturday, 16 August 2014

ग़ज़ल - 6 मायाजाल ही तो है


माया का जाल ही तो है, अपना ही साया तो
राम तो मिलेंगे ही, मिली न माया तो ?

मैं चक्रव्यूह में फँसा ये सोच में गुम हूँ

आ तो गया हूँ पर मैं, निकल ही न पाया तो ?


दरख़्वास्त तो की है, ख़ुदा की शान में मगर ख़त का जवाब आए तो, फिर भी न आया तो ?

यूँ तो ये ज़िन्दगी भी है मस्लात से सनी जीना है एक उम्र ग़र, ज़हर न खाया तो ?

साज़ की आवाज़ में कुछ वो नहीं है बात गाना तो है ये गाना, सुर में न गाया तो ?

चुपड़ी नहीं तो रूखी ही मिल जाएगी रोटी लेकिन ये सोचता हूँ मैं, तनख़्वाह न लाया तो ?

Tuesday, 12 August 2014

ग़ज़ल -5 सुबह से शाम हो गई

सुबह से शाम हो गई
कोशिशें नाकाम हुईं ।

इंकलाबी चाह में
अपनी अना की हार हुई ।

सच के जश्न में चले
ज़बान संगसार हुई ।

रोज़ी के इंतज़ाम में
उम्र यूँ तमाम हुई ।

छल-कपट के राज में
फिर से शह और मात हुई ।

सियासी भेड़चाल में
रूह भी हैरान हुई ।

चेहरों पे चेहरे देख के 
चेहरे की न पहचान हुई ।

Monday, 11 August 2014

अश्आर-२

 बद-ग़ुमानी बाग़बान की बराए ख़ुदा अपमान है,
ख़ाक-ए-सोहबत पा के ही इंसां जहाँ में महान है


ज़ख़्म-ए-रूह कुरेदते क्यों हो
मैं जो न हो सकूँ, कहते वो क्यों हो

इक ग़म को सीने से लगा रक्खा है,
शेखी, ऐ शैख़ इतनी, बखेरते क्यों हो

मैं तो आज भी अपने ही आप में गुम था
हयात-ए-हवादिस से सताते क्यों हो

Monday, 4 August 2014

ग़ज़ल - 4 नमक





 नक़्क़ाश की नज़र से नुमायाँ हुआ नमक
 कुछ ज़ख़्म पर पड़ा था ग़मख़्वार का नमक


 
नज़ीफ-ए-नमकख़्वारी* से अदा हुआ नमक
 नज़्म की नवाज़िश में दरोगा हुआ नमक

* शुद्ध स्वामिभक्ति


 
 नायाब हो गई है इंसां की जात लेकिन
 मज़दूर का पसीना, है और क्या नमक 



नमकीन है निहायत आँखों की ये नमी
नौबत यहाँ तक आई, नेमत हुआ नमक


नापाक़ नाख़ुदा की नवाबी है ये नसीहत अहसान तुझ पे है ये, खाया है जो नमक


चैन-ओ-अमन की निस्बत, यक़ीनन हो बेपनाह
ज़्यादा न हो अगर तो, कम भी न हो नमक

Friday, 1 August 2014

अश्आर

ज़िंदा है जो जिग़र में, जज़्बा-ए-जाँनिसारी
जन्नत है ज़िन्दगी ये, जश्न-ए-जहान-ए-फ़ानी*

* नश्वर संसार

नक़्क़ाश की नज़र से नुमायाँ हुआ नमक
कुछ ज़ख़्म पर पड़ा था ग़मख़्वार का नमक


 नज़ीफ-ए-नमकख़्वारी* से अदा हुआ नमक
नज़्म की नवाज़िश में दरोगा हुआ नमक

* शुद्ध स्वामिभक्ति


नायाब हो गई है इंसां की जात लेकिन
मज़दूर का पसीना, है और क्या नमक


नमकीन है निहायत आँखों की ये नमी
नौबत यहाँ तक आई, नेमत हुआ नमक


नापाक़ नाख़ुदा की नवाबी है ये नसीहत
अहसान तुझ पे है ये, खाया है जो नमक


चैन-ओ-अमन की निस्बत, यक़ीनन हो बेपनाह

ज़्यादा न हो अगर तो, कम भी न हो नमक