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Sunday, 7 September 2014

ग़ज़ल - 9 पानी गया ऊपर से सर के


पानी गया ऊपर से सर के, कर भला अब कुछ तो कर मुल्क पहुँचा है रसातल, ऐ ख़ुदा अब कुछ तो कर


मैं ही मैं हूँ अब जहां में, और सब पैरों की धूल बदग़ुमानी छोड़ कर, तू बाज़ आ, अब कुछ तो कर


लुप्त होते जानवर, व पेड़-पौधे विश्व से प्रकृति का ह्रास कर, की है ख़ता अब कुछ तो कर


ज़िन्दगी का है तकाज़ा, जो न समझा प्यार को मंज़िल-ए-मक्सूद तो है लापता अब कुछ तो कर


फ़ितरत-ए-आदम ने पहुँचाया है अब रोज़-ए-जज़ा साँस लेना भी न हो जाए सज़ा अब कुछ तो कर

Thursday, 28 August 2014

गज़ल - 8 लिखनी है दास्तां तो


लिखनी है दास्तां तो लहू को मिला के लिख तासीर में है नर्मी तो फिर तिलमिला के लिख

बेदर्द ज़माने की हैं अपनी ही सीरतें कुछ यूँ कहो कलाम कि दुनिया हिला के लिख


रस्ता जो चुन लिया है तो मुड़ कर न देखना मतलब के आसमान को ज़हर पिला के लिख


जज़्बात मर न जाएं यूँ ही दौड़ धूप में लफ़्ज़ों से कोरे काग़ज़ पर गुल खिला के लिख

दिखता नहीं ख़ुदा तो यूँ मायूस न रहो खुद अपने ज़हन में ही ख़ुदाई जिला के लिख