RUMINATIONS
Square peg in a circular hole trying to fit in.
Tuesday, 19 May 2015
ख़ुदी को कर ख़ुदा-हाफ़िज़
ख़ुदी को कर ख़ुदा-हाफ़िज़, मुहाफ़िज़ है ख़ुदा तेरा
पेश-ख़िद् मत जान कर, फिर ख़्वार हो या संगसार
Tuesday, 5 May 2015
वक़्त है कम और काम बहुत है
वक़्त है कम और काम बहुत है
जीवन में जंजाल बहुत है
खुशियाँ तो खरीदी मण्डी में
जाने क्यों पर दाम बहुत है
ऊपर वाले नीचे आ
देख यहाँ पर धाम बहुत हैं
क्या मैं भी अब कर लूँ सौदा
अना का बिकना आम बहुत है
ज़ख़्म तो आप ही भर जाएंगे
वक़्त यहाँ बलवान बहुत है
नौकरशाही जान की दुश्मन
कहने को आराम बहुत है
झूठ को सच और सच को झूठ
बोलो तो फिर माल बहुत है
कह न देना दिल की बातें
दीवारों के कान बहुत हैं
हार के क्यों बैठूँ मैं, बताओ
अभी तो मुझ में जान बहुत है
मस्ती का सामान बहुत है
जीवन की अब शाम बहुत है
#जुर्अत
Sunday, 26 April 2015
कुछ बात तो है। Kuchh baat to hai
कुछ बात तो है जो मचल रही है
ज़मीन करवट बदल रही है
खेले का अंतिम समय है लगता
ख़ुदाई ख़ुदा-न-ख़्वास्त जल रही है
कारवाँ मंज़िल पे पहुँचे न पहुँचे
क़यामत की आमद हर पल रही है
ख़ौफ़नाक मंज़र में मुर्दनी का आलम है
दिन तो गुज़ारा है, रात निकल रही है
ख़्वाहिशें दिलों में दफ़न न हो जाएं
ज़िंदगी है कि हाथों से फिसल रही है
Kuchh baat hai jo machal rahi hai
Zameen karwat badal rahi hai
Khele ka antim samay hai lagta
Khudaai Khuda-na-khwaasta jal rahi hai
Kaarwaa'n manzil pe pahunche na pahunche
Qayaamat ki aamad har pal rahi hai
Khaufnaak manzar mein murdanee ka aalam hai
Din to guzaara hai raat nikal rahi hai
Khwaahishein dilo'n mein dafan na ho jaayein
Zindagi hai ki haatho'n se fisal rahi hai
Sunday, 12 April 2015
किस्मत
हथेली पे छपी
लकीरों में छुपी
जो किस्मत है,
उंगलियाँ समेट कर
हथेली से मिलाकर
सँवरती है ।
#जुर्अत
Tuesday, 17 March 2015
देखा जो दो घड़ी तो
देखा जो दो घड़ी तो, खुलने लगी परत
कोई तो मिलेगा कभी, बिन नक़ाब के
चलता हूँ तो गिरता हूँ नज़र में
रुकता हूँ तो गिरता हूँ नज़र से
यूँ तो है दमख़म ज़मीन-ओ-आसमां कम है
पर काटकर परवाज़ की तन्क़ीद हो 'जुर्अत'
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