Tuesday, 5 April 2016

बेवकूफ़

बेवकूफ़ @dogtired1
पिछले 22 सालों से लगातार बिना नागा ज़िन्दगी के 8 घंटे सरकार को लगान स्वरुप दे रहा हूँ . लगान क्या - चाकरी है,  न कोई  लाग लपेट और न ही फल की इच्छा.  शाम 6 बजे दफ़्तर से निकलते ही  अंतर्मन का  सूर्योदय होता है. न तीन में न तेरह में, न दुनियादारी की परवाह, न ऊंचा उड़ने की ख्वाहिश. न ग़लत सोचा न बुरा किया. ज़िन्दगी की दौड़ में पैदल मैं भी शुमार हूँ. लेकिन अपने आस-पास लोगों की रफ़्तार से डरता हूँ क्योंकि लोग समझाते हैं – बेवकूफ़ी न कर, बहती गंगा में हाथ धो ले.

बेवकूफ़ हूँ या बेवकूफ़ी कर लूँ. 

Monday, 29 February 2016

सर चढ़ के ज़हर घोल, बोल रहा है सफ़्फ़ाक
शातिर का शर्मनाक सबब बेज़ुबान है

Tuesday, 23 February 2016

आज फिर खुद से मूलाकात हो गई

आज फिर ख़ुद से मूलाकात हो गई,
खिली धूप में फिर बरसात हो गई

एक छोटा-सा सच बोल बैठा,
जाने क्यों दिन में रात हो गई

अंधे ने रेवड़ी क्या खूब बाँटी,
वज़ीर ले कर भी मात हो गई

इज़हारे-तमन्ना और क्या करता,
आँखों-आँखों में मात हो गई

ये दुनिया है दुनिया 'जुरअत' मियाँ
जहाँ आँखें बंद की घात हो गई

Monday, 9 November 2015

न लिख दूँ कुछ कि फिर अफ़सोस हो
कलम काग़ज मेरे सब छीन लो

सिपाही जंग में माहिर तो है
अदू पर वार का निर्णय तो हो

अब तो ये जान

अब तो ये जान ले ले कोई,
दिला दे निजात जीवन से कोई

सेक लग सकता है ! सावधान
ज़ेहन में आग लगी है कोई

सर दर्द बदन दर्द बहुत हुआ,
अब तो गला ही दबा दे कोई

इम्तिहान बस, और मादा नहीं
अब तो मुआफ़ ही न कर दे कोई